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 Dr. Kiran Tripathiडॉ किरण त्रिपाठी का जन्म आज के झारखंड के बरवाडीह (लातेहार जिला) में 23 अगस्त 1962 को कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हुआ था। पिता स्वतंत्रता सेनानी थे और घर के सभी सदस्य आध्यात्मिक विचार वाले तथा समाज के प्रति संवेदनशील थे। प्राकृतिक संस्कार स्वरूप सेवाभाव ही था और पिता सदैव इस विषय से सम्बंधित प्रेरक प्रसंग सुनाते थे अतः उन्हीं को गुरू और आदर्श मानने लगीं। संपन्न परिवार में जन्मी बालिका को परिवार के लोग कृष्णा और नचिकेता पुकारने लगे। बचपन से ही न्यायपूर्ण और शान्त स्वभाव होने के कारण उन्हें घर में आदर्शस्वरूप माना जाने लगा।

 

पूजा, पाठ, दया, दान की प्रवृति बाल्यकाल से थी और बहुत कम आयु से ही जिम्मेदारी वहन करने लगीं। लोगों का दुःख और पीड़ा देख उनमें चाहत होती थी कि वे कहें और लोगों के दुःख दूर हो जायें। ईश्वर आराधना में प्रतिदिन 5-6 घंटे तन्मय रहा करती थीं। पूजा-पाठ करके उठती और किसी को कुछ अच्छा कह देती थीं तो वैसा ही हो जाता था।

 

Dr. Kiran Tripathi in 1978Dr. Kiran Tripathi in 1978

Dr. Kiran Tripathi in 1972Dr. Kiran Tripathi in 1972

बरवाडीह में ही उन्होंने स्कूली शिक्षा पूरी की। 1972 में सुख-दुःख, अमीरी-गरीबी को जानने के क्रम में "भाग्य" शब्द को जानी। इस "भाग्य" को जानने, समझने, खोजने के प्रयास में उन्होंने अंततः ज्योतिष शास्त्र में प्रवेश किया। वेदों, उपनिषदों का अध्ययन करने के लिए संस्कृत विषय को चुनीं। रांची के निर्मला कॉलेज से B.A. और रांची विश्वविद्यालय से M.A. की डिग्री प्राप्त की।  'अद्वैत वेदान्त में महावाक्यार्थ निरूपण' विषय से Ph.D की उपाधि पाप्त की।

दर्शन शास्त्र से कर्म काण्ड और ज्ञान की समझ मिली। दर्शन शास्त्र को पढ़ते हुए ध्यान साधना में उतर गयीं। इसके बाद समझीं की भाग्य क्या है और ज्ञान से कैसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। बाकी छात्राओं के कॉलेज जाने पर एकांत में होस्टल या किसी मंदिर में घंटों ध्यान लगाने लगीं। शीघ्र ही ध्यान की गहराईयों में उतरने लगीं और आत्मा-परमात्मा, जन्म-मरण, पुनर्जन्म सब कुछ का निकट से अनुभव हुआ।

 

 

माता-पिता के करुणाप्लुत नेत्रों को नहीं देख सकीं इसलिए एक चिकित्सक से विवाह की स्वीकृति दे दी। 6 मार्च 1987 को रांची में डॉ. आर.के. त्रिपाठी से विवाह हुआ। उनके दो बच्चे (पुत्र एवं पुत्री) हैं। आध्यात्मिक जीवन और असामान्य कार्य करने में पति ने कभी हतोत्साहित नहीं किया और पूर्ण सहयोग दिया।

Reiki Camp in Women's Remand Home, Patna - 2003Reiki Camp in Women's Remand Home, Patna - 2003

बोलने में निपुण डॉ. किरण को राजनीति में लाने के लिए कई लोगों ने प्रयास किया पर उन्होंने बहुत पहले ही जान लिया कि राजनीति उनके लिए नहीं है। 1990 में पिता की मृत्यु के पश्चात ध्यान साधना में अधिक से अधिक समय देने लगीं और अंतर्ध्यान की पुकार सुन ज्योतिष शास्त्र से लोगों को मार्गदर्शन देने के लिए 1995 में पटना में "पराविद्या अनुसन्धान केंद्र" की स्थापना की। दो दशकों में डॉ किरण ने ज्योतिष विद्या और पराविद्या से हजारों लोगों की गंभीर समस्याओं का समाधान किया है; कई अपराधियों को भी समीप रख सही राह पर ला चुकी हैं।

 

Books Written by Dr. Kiran TripathiBooks Written by Dr. Kiran Tripathi

वेदों, उपनिषदों, दर्शन-शास्त्र और ज्योतिष विद्या पर कई पुस्तकें प्रकाशित कर अपने अनुभवों को लोगों तक पहुँचाने के लिए प्रयासरत हैं। बचपन से ही वे कविताएँ भी लिख रही हैं।

उनकी कुछ प्रकाशित पुस्तकें हैं :

 

 

गांधीजी के तीन बंदरों ने बहुत प्रभावित किया और उन्होंने इसका अर्थ जाना की शक्ति को संरक्षित करना चाहिए - मौन व्रत रखो, बाहर का कम सुनो और आँखें बाहर नहीं भीतर की ओर खोलो, बाहरी दुनिया से विमुख होकर पहले अंदर देखना चाहिए। अंतर की ओर देखने से ही ज्ञान की प्राप्ति हुई।

 

2015"मैं साक्षी भाव में रह कर अपने सारे दायित्वों का निर्वाह करते हुए समाज के कल्याण के लिए प्रयत्नशील हूँ।"

"मैं साक्षी भाव में रह कर अपने सारे दायित्वों का निर्वाह करते हुए समाज के कल्याण के लिए प्रयत्नशील हूँ।"


रामचरित मानस की प्रिय पंक्ति -

निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥