Ved Vimarsh by Dr. Kiran Tripathi

परमात्मयोगी भगवान् नारायण ने अपने सर्ववेदस्वरूप से सृष्टि-प्रक्रिया में किंकर्तव्यविमूढ़ स्रष्टा को निर्देश दिया कि कल्पान्त-काल से मेरे स्वरूप में अवस्थित जो प्राणी हैं, उनकी यथापूर्व-पूर्वकल्प के अनुसार ही सृष्टि करें। ऐसा उपदेश कर भगवान् के अन्तर्हित हो जाने पर लोकपितामह ब्रह्मा ने दैहिक तथा मानसिक विविध प्रकार की प्रजाओं की सृष्टि की:


अन्तर्हिते भगवति ब्रह्म लोक पितामहः ।
प्रजाः ससर्ज कतिधा दैहिकीमनिसीर्विभुः ।।


सम्पूर्ण सृष्टि के थिरक से विलीन हो जाने तक विस्तार गुरु वेदों में है- सरल शब्दों में सरल हृदय में प्रतिष्ठित करने का प्रयास प्रस्तुत- ‘वेद विमर्श' में है।

 

 

First Edition : 2015
Price : Rs. 400
ISBN : 978-93-84767-25-9
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